मध्य प्रदेश

रतलाम में अनोखी दीपावली, मुक्तिधामों में जलेंगे हजारों दीये; आतिशबाजी और दीपदान से होगा आयोजन

रतलाम
 जहां मुक्तिधाम में अपनों को अंतिम विदाई दी जाती है, वहीं रतलाम में साल में एक शाम ऐसा भी आता है, जब यही स्थल दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है।पूर्वजों की स्मृति में चिता स्थलों पर दीप जलाए जाते हैं, रंग-बिरंगी रंगोलियां सजती हैं और आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव मनाया जाता है। यह अनूठी परंपरा शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। इस वर्ष भी आज  7 नवंबर, शनिवार को त्रिवेणी मुक्तिधाम में यह आयोजन होगा।

श्रद्धा के अनुसार दीपदान करते
दीपावली के अवसर पर निभाई जाने वाली इस परंपरा में शहरवासी अपने पूर्वजों के अंतिम विश्राम स्थल पर दीपदान कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। शाम होते ही परिवारों का पहुंचना शुरू हो जाता है। महिलाएं और बच्चे भी दीप लेकर पहुंचते हैं। मुक्तिधाम परिसर में रंगोलियां सजाई जाती हैं और आतिशबाजी से माहौल रोशन हो उठता है। शहर के अन्य मुक्तिधामों में भी लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार दीपदान करते हैं।

प्रेरणा संस्था से जुड़े गोपाल सोनी ने बताया कि वर्ष 2006 में संस्था के पांच सदस्यों ने शहर के मुख्य त्रिवेणी मुक्तिधाम में दीपदान की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे इस आयोजन से और लोग जुड़ते गए। अब बड़े स्तर पर मुक्तिधाम में दीपावली मनाई जाती है। इसमें बच्चे, महिलाएं और परिवार के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

पूर्वजों की याद में करते हैं दीपदान

गोपाल सोनी के अनुसार, मुक्तिधाम में दीपदान कर लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं। मान्यता है कि यदि पूर्वज किन्हीं कारणों से अंधकार में हैं, तो उन्हें प्रकाश की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इसे पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि माना जाता है। उनका कहना है कि आज हम जो कुछ भी हैं, उसमें पूर्वजों का योगदान और आशीर्वाद है।

शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए यमराज को दीपदान करने का महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यमराज की पूजा और दीपदान करने से यम यातना और नरक के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

एक छोटी-सी पहल सामूहिक परंपरा में बदल गई
इस परंपरा की शुरुआत प्रेरणा संस्था के संस्थापक गोपाल सो
नी ने वर्ष 2006 में की थी। तब संस्था के पांच लोगों ने मिलकर श्मशान में दीपदान का आयोजन किया था। धीरे-धीरे शहरवासी इससे जुड़ते गए और एक छोटी-सी पहल सामूहिक परंपरा में बदल गई। आज यह आयोजन पूर्वजों के प्रति सम्मान, स्मृति और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक बन गया है

पांच लोगों की पहल बनी शहर की परंपरा

    वर्ष 2006 में प्रेरणा संस्था ने शुरू किया दीपदान।
    मुख्य आयोजन स्थल प्राचीन त्रिवेणी मुक्तिधाम।चिता स्थलों पर दीप, रंगोली और आतिशबाजी।
    पूर्वजों को याद कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना।वाघेला समिति मनाएगी वृद्धाश्रमों और गोशालाओं में दीपोत्सव
    दीपावली पर्व वाघेला गो सेवा जीव दया समिति के सदस्य वृद्धाश्रमों में वृद्धजनों के साथ मनाएगी। संत आत्मानंद सरस्वती के सानिध्य में समिति शहर के सभी प्रमुख वृद्धाश्रमों, त्रिवेणी स्थित बद्रीनारायण अन्न क्षेत्र तथा गोशालाओं में कार्यरत गोसेवकों को उनकी पसंद का सामूहिक भोज कराएगी। समिति प्रमुख दिनेश वाघेला ने बताया कि समिति हर वर्ष इन वृद्धजनों के बीच दीपावली उत्सव मनाती है ताकि उन्हें त्योहारों पर अकेलापन महसूस न हो। इस दौरान बाबूलाल सिसोदिया, गोविंद सिंह शेखावत, महिला मंडल प्रमुख श्यामा वाघेला, शकुंतला सिसोदिया और आशा भट्ट ने नगर के धर्मपरायण सज्जनों और महिलाओं से आग्रह किया है कि वे 8 नवंबर को सुबह 11 बजे लक्कड़ पीठा स्थित अन्नपूर्णा वृद्ध आश्रम में पहुंचकर इस पर्व पर सेवा का पुण्य लाभ लें।

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